मेनलैंड वाले नस्लवादी भारतीय कोविड से अधिक भयानक थे – Episode#3

Summary

चोंग्थम रामेश्वरी (Chongtham Rameshwori) द्वारा लिखा यह आलेख कोरोना-काल में पूर्वोत्तर के लोगों के साथ दिल्ली या भारत के कथित मेनस्ट्रीम लोगों के द्वारा किये जाते बर्ताव से जुड़ा है जो मेनस्ट्रीम के नस्लवाद की परते उधेड़ता है. रामेश्वरी जो कि दिल्ली विश्वविद्यालय में एक विद्यार्थी हैं, अपने अनुभवों को साझा करते हुए इस मुद्दे को एक व्यापक फलक पर ब्यान करती हैं. 

इस आलेख को आवाज़ दी है गुरिंदर आज़ाद ने. 

Transcription

चोन्थम रामेश्वरी (Chongtham Rameshwori)

मेरे फ़ोन में रात के 9:21 का समय दर्ज है जिसमें मेरी पसंदीदा टीशर्ट की पहली फोटो है, जो दरअसल, एक अभागी टीशर्ट है. इसपर अब, गले और सीने के हिस्से पर, तंबाकू वाले पान के थूक की परत जम गई है जिससे एक तीखी गंध आ रही है. 22 मार्च 2020 को, रात 9 बजे राष्ट्रव्यापी कर्फ्यू समाप्त होने के बाद, मैं अपने दोस्त के साथ कुछ किराने का सामान खरीदने के लिए बाहर गई. ज़रूरी सामान की आपूर्ति करनी ज़रूरी थी क्यूंकि अगले दिन से ही राष्ट्रव्यापी लॉक डाउन (तालाबंदी) शुरू होने वाला था. मैंने एक मध्यम-से आकार की गोभी, लोकी आदि और एक बैंगन, सभी 100 रुपये में खरीदा और अपने पी.जी. को वापिस आने वाले रास्ते चल दी. यह वही सड़क थी जिससे मैं पिछले सात सालों से गुज़र रही थी. कुछ गली के कुत्तों (स्ट्रीट डॉग्स) के अलावा पूरी सड़क ही सुनसान थी. मैंने देखा कि एक अधेड़ उम्र का उत्तर-भारतीय व्यक्ति विपरीत दिशा से मेरी ओर चला रहा है। मैं बस सोच रही थी कि वह व्यक्ति अपने वाहन को धीमा क्यों कर रहा है और क्यूँ मेरे इतने करीब से गुज़ार रहा है? मुझे एहसास हो चला था कि यह व्यक्ति मुझे ज़रूर कुछ न कुछ कहेगा या हो सकता है कि मुझपर हमला कर दे! इतने में अचानक उसने अपने मुंह में भरे तंबाकू को मेरे चेहरे पर थूक दिया, जैसे मैं कोई कचरे का ढेर या सड़क के किनारे का नाला थी जहाँ वह अपने मुँह से गंदगी को थूक सकता था। दूर जाते हुए वह चिल्लाया “कोरोना”. मैंने उसके पीछे दौड़ने की कोशिश की, लेकिन केवल चिल्ला कर रह गई.

बदबूदार पान का तरल मेरी आँखों में घुस गया और घृणित पान मेरे सीने, मेरे बालों और उस मास्क पर गिर गया जिसे मैंने पहना था। उसने अपने वाहन को नहीं रोका, पीछे मुड़कर नहीं देखा और ऐसे चलता चला गया जैसे कुछ हुआ ही न हो। वहाँ आसपास कोई नहीं था, और अगर कोई होता भी तो मुझे इस ‘मेनलैंड’ भारतीयों से किसी भी तरह की मदद की उम्मीद नहीं थी, सिवा इसके कि कोई एक करुणा का शब्द बोल दे. मैं इतनी सदमे में थी कि न तो कोई प्रतिक्रिया कर पाई न आगे कोई शब्द ही बोल पाई, और मेरी आँखें उस गंदे चबाये गए पान से जलने लगीं, मेरे मन में पहला विचार आया कि मैं अपने कमरे में वापिस जाऊं और चेहरा धोऊँ। कोविड महामारी के बीच किसी बीमारी के हो जाने की आशंका से मैं बेहद डरी हुई थी. मैं अपने पी.जी. वापिस चली गई, नहाई और कपड़े बदले, जबकि यह सब करते हुए मैं गुस्से से कांप रही थी.


मैं 2013 से दिल्ली में रह रही हूँ और मुझे सामान्य रूप से नस्लीय शब्द कहे जाते रहे हैं, जैसे “चिंकी, मोमो, नेपाली, चीनी” और यह अनगिनत बार हुआ लेकिन कभी भी इस तरह के भयावह हमले का सामना नहीं करना पड़ा। यह आदमी जानबूझकर मेरे चेहरे को निशाना बना रहा था और “कोरोना- कोरोना” चिल्ला रहा था – वह स्पष्ट रूप से एक ‘चिंकी’ की पहचान कर सकता था। उसने सोचा होगा- यहाँ एक चिंकी है और मैं उस पर थूक सकता हूँ, क्योंकि वो एक ऐसी नस्ल है जो मनुष्यों की तुलना में कमतर होती है और वह केवल कचरे के ढेर होते हैं जहाँ मैं अपने गंदे पान के अवशेषों को थूक सकता हूँ, ‘क्योंकि चिंकीज़ ऐसा होने पर क्या ही कर लेंगे.’

खैर, मुखर्जी नगर पुलिस स्टेशन द्वारा उसे गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन उसने यह कहते हुए बहाना बनाया कि “वह शराब के नशे के प्रभाव में था और मेरे चेहरे और मेरे शरीर पर उसका थूक अनजाने में गिरा था और उसे इस बात का बहुत अफ़सोस है।” एक ऍफ़आईआर, आईपीसी की धारा 509 (एक महिला की शालीनता का अपमान करने के इरादे से) के तहत दर्ज की गई थी, जो कि जमानती है तो इस तरह नस्लवाद के सवाल, किसी महिला के साथ मारपीट और यहां तक कि किसी संक्रमण या बीमारी के फैलने की संभावना सब कुछ गौण हो जाता है. मुझे अगली सुबह तक आईपीसी के बारे में कोई सुराग नहीं था जब तक कि दो पुलिस कर्मियों ने मुझे एफआईआर की एक प्रति नहीं सौंपी।

मेरे साथ जो घटना घटी वह एक बड़ी समस्या की छोटी सी झलक मात्र है. यह ‘मेनलैंड’ भारतीयों के द्वारा पूर्वोत्तर के (लोगों) खिलाफ निर्देशित नस्लवादी घृणास्पद अपराधों की कई घटनाओं में से एक थी। जैसा कि कोरोना आतंक के कारण ज्यादातर पूर्वोत्तर के लोग घर चले गए थे, लेकिन हम में से कुछ ऐसे थे जो पीछे रह गए थे और ऐसा लगता था कि इन मेनलैंड भूमिवासियों के लिए हम ‘चिंकियों’ का शिकार करने का यह सही समय है। मैंने यही महसूस किया- मेरा शिकार हुआ है। ऐसा केवल महामारी के कारण नहीं हुआ, बल्कि मेनलैंड के बाशिंदों द्वारा लगातार बढ़ते नस्लीय हमलों के चलते भी था कि हमारे लिए एक जानलेवा स्थिति बन गई थी। अपने मुंह को ढके वे हमारे पास से गुजरने पर हमें “कोरोनावायरस”, “कोरोना” कहते हैं, या नकली खांसी खांसते हैं, हमें बुनियादी ज़रूरतों को हासिल नहीं करने देते, हमें किराए के कमरे छोड़ने के लिए मजबूर करते हैं, कई जगहों पर शारीरिक शोषण हुआ, असंख्य बार ऐसा हुआ कि क्रूरता से पीटा गया, ये सब सबूत हैं कि महामारी ने वास्तव में मेनलैंड इंडियनस के दिमागों के भीतर कहीं सतहों में बैठे एक नस्लवादी शिकारी स्वभाव को फिर से सतह पर ला दिया. कोविड वास्तव में ‘चिंकीज़’ पर हमला करने और उन्हें परेशान करने का एक सही बहाना था।

‘कोरोना’ और ‘कोरोनावायरस’ जैसी जो फब्तियाँ नार्थ-ईस्ट के लोगों के लिए बनाई गईं हैं, यह सामान्य फब्तियों में एक बढ़ौतरी है, फिर चाहे ये फब्तियाँ कसने वाले, बच्चे से लेकर प्रोढ़ उम्र के लोग ही क्यूँ न हों (20 वर्षीय मणिपुरी महिला पर, गुरुग्राम में, मेनलैंड वाली एक वृद्ध महिला ने कोरोना फैलाने का आरोप लगाया और फिर उसके पुत्र और पुत्रवधू ने उस मणिपुरी महिला पर क्रूरता से हमला किया था) बस एक ‘चिंकी’ चेहरा होना ही काफी है. कथित ‘चिंकीज’ को कोरोना कहना या उन पर बीमारी फैलाने का आरोप लगाना केवल नस्लवाद की घृणित अभिव्यक्ति थी और कुछ नहीं। इस प्रकार नस्लवाद एक और महामारी थी जिसका सामना नॉर्थ-ईस्ट के ‘चिंकीयों’ ने कोविड महामारी के दौरान किया. इस कोरोना बिमारी से कहीं अधिक भयावह था नस्लवादी मेनलैंड वाले भारतीयों का नस्लवाद. हालांकि इन घटनाओं में से अधिकांश बिना किसी रिपोर्ट के ही हवा हो गईं, लोगों के ध्यान में ही नहीं आईं लेकिन कई तस्वीरें और विडियो जिनकी सोशल मीडिया पर बाढ़ आ गई थी, वह साबित करते हैं कि कोविड ने दरअसल मेनलैंड भारतीयों को सड़कों, डिपार्टमेंटल स्टोर्स, पार्कों, किराए के कमरों और हर जगह ही ‘चिंकीज़’ को सताने का एक दम बढ़िया मौका उपलब्ध कराया है. महामारी के कारण पैदा हुई सामूहिक घबराहट से भी ऊपर, नस्लवाद की लगातार बढ़ती घटनाओं के कारण एक भय-मनोविकृति पैदा हो गई, और यह एक बड़ा कारण बना भारत के प्रमुख शहरों से हजारों पूर्वोत्तर के लोगों के बड़े पैमाने पर पलायन का.

मुख्यभूमि के लोगों द्वारा ‘चिंकी’ की पहचान पर सवाल उठाने की प्रवृति जो आम ही पाई जाती थी, कई घटनाओं के चलते बढ़ने लगीं. ऐसी घटनाएँ जैसे कि सुपरमार्केट में भीतर आने से मना करना या किसी ‘मेनलैंड’ वाले किसी शराबी का एक मणिपुरी महिला के फ्लैट में घुस जाना और उन्हें निकल जाने को कहकर तंग करना, आम थीं, क्यूँ कि हो सकता है वह मणिपुरी महिला ‘चायनीज़’ बिमारी से ग्रसित हो. जब नस्लवाद के ऐसे मामले पैदा हुए तो “हम भी भारतीय हैं” का नेरेटिव पैदा हुआ, हालांकि ये बात भी है कि इससे कभी मदद नहीं मिली. नस्लवाद के असली मुद्दे को संबोधित करने के बजाय, मेनलैंड भारतीय पत्रकारों, जो नस्लवाद को समझने का ज़रा भी प्रयास नहीं करते, बल्कि बार बार यह बेकार नेरेटिव थोपने में ज़रा संकोच नहीं करते कि चिंकीज़ भी भारतीय हैं। यह नेरेटिव केवल इस विचार का उल्लेख करता है कि आपकी सुरक्षा आपकी भारतीयता पर निर्भर है जबकि अगर आप भारतीय नहीं हो और यहाँ के भारत और इसके कल्पित समुदाय से संबंधित नहीं होने पर यह हमला करने और दुर्व्यवहार करने की अनुमति है।

एक जानी-मानी महिला पत्रकार ने, जब मैं हमारे साथ हो रहे बुरे व्यवहार का उल्लेख कर रही थी, उसने मुझे यह टेढ़ी बात कहीं – “मेरा मतलब है, आप तो ‘हमारे’ ही देश में हैं, नहीं क्या? आप हमारा एक हिस्सा हैं। आप एक भारतीय हैं और आपके साथ ऐसा बर्ताव किया जा रहा है वह ज़रूर ही भयानक होगा.” यह हमारे ऊपर थोपते और याद दिलाते हुए कि ‘चिंकी’ भी भारतीय हैं और इसलिए उन पर नस्लीय हमला नहीं किया जाना चाहिए, इस महिला ने इस तथ्य को आसानी से नजरअंदाज कर दिया कि वैश्विक महामारी के बीच मुख्य रूप से मेनलैंड भारत के शहरों में ‘चिंकी’ को विशेषतः लक्षित किया गया था और उसपर हमला किया गया था। गुवाहाटी के एक अन्य पत्रकार ने एक भयावह घटना की, नस्लीय रूप से सामने आई प्रकृति को इंगित करने से, इनकार कर दिया, इसके बजाय उसने इसे “प्रोफाइलिंग” कहा और कहा कि ‘कोरोना’ कहा जाने के पीछे शायद इसका “चीनी कनेक्शन” रहा होगा.

मेरे अपने हिस्से के अनुभव के चलते मुझे महसूस हुआ कि मुझे अकादमिक सर्कल में एक और निराशाजनक वास्तविकता को उजागर करना है. वह ये कि समावेश (inclusion) करने की समग्र भावना पर मुख्यभूमि (मेनलैंड इंडियन) के विद्वान गर्व करते हैं और अकादमिक स्थानों में नाटकीय रूप से दिखावा करते हैं। मेनलैंड की महिला विद्वान जो गर्व से अंतःप्रतिच्छेदन (intersectional) नारीवाद की वकालत करती हैं, वे उस समय एक शब्द का उच्चारण नहीं करतीं जब ‘चिंकी’ महिलाओं को राज्य द्वारा हिंसा का शिकार बनाया जाता है या भारतीय मेनलैंड के पुरुषों और महिलाओं द्वारा नस्लीय हमला किया जाता है। जब वे प्रतिच्छेदन (intersectionality) के लिए आह्वान करती हैं तो वह तो बस उत्तर-पूर्व की ‘चिंकी’ महिलाओं के लिए ही है और यह केवल अकादमिक पेपरों और बातचीत तक ही सीमित है। मैं निजी तौर पर मेनलैंड के सहयोगियों से दो-चार हुई हूँ जो विश्वविद्यालय परिसर में अपनी ‘जागृत’ छवि बनाए रखते हैं लेकिन बेशर्मी से एशियाई पुरुषों के ‘आकार’ को लेकर उनका मजाक बनाते हैं।

मेरे साथ हुई घटना के एक महीने बाद, इस विश्वविद्यालय के वरिष्ठ, जो मूल रूप से एक अजनबी थे, ने मुझसे फेसबुक पर पूछा कि क्या मुझे नॉर्थ कैंपस में “सस्ते बूज़” (शराब) का कोई ठिकाना पता है। जब मैंने जवाब दिया कि अजनबियों से इसके बारे में पूछना उसके लिए अच्छा नहीं, और यह भी कहा कि कैसे उसके द्वारा यह पूछे जाना एक नस्लीय स्टीरियोटाइपिंग है, तो मुझे बताया गया कि मैं “पागल जैसी” लग रही थी और “असभ्य” और ” बदज़बानी करनेवाली” लड़की थी. यह व्यक्ति जिसे, मेरे साथ जो हुआ था उसके बारे में हालही में पता चला था वह अपना झूठा सोहार्द झाड़ बैठा था और अब मुझे बता रहा था कि मैं पागल लग रही थी. जब आप नस्लवाद या किसी अन्य प्रकार के उत्पीड़न का सामना, प्रतिदिन घटने वाली वास्तविकता के रूप में करते हैं, और जब आपके पास आपके साथ ताज़ा घटी हिंसा का निजी अनुभव होता है, स्वाभाविक रूप से, आपको इस तरह के सवालों के पीछे के इरादों पर संदेह होता है, जैसे कि इस अजनबी व्यति ने जो सवाल किये. यह बेहद अपमानजनक है और वास्तव में गैसलाइटिंग का एक सूक्ष्म रूप है कि दूसरों को पागल या संवेदनशील कहना, उन्हें पागल कहने के लिए उन्हें कॉल करना. जबकि हकीक़त यह है कि शोषित के लिए यह कोई मानसिक उन्माद न होकर एक बेहद वास्तविक और हमेशा बना रहने वाला एक डर है।

चीजें ज्यादातर सामान्य हो चली हैं और ‘चिंकीयों’ के खिलाफ नस्लीय हमलों की घटनाएं अब कम ही सुनाई देती हैं, लेकिन भले ही कोरोना समाप्त हो या न हो, नस्लवाद की वास्तविकता मेनलैंड भारतीय शहरों में आने वाले हर ‘चिंकी’ को परेशान करती रहेगी। जबकि यह उल्लेखनीय है कि नस्लीय हमलों के शिकार ज्यादातर छात्र या अन्य लोग प्रवासी हैं जो सर्विस सेक्टर आदि में काम करते हैं, जो लोग सुरक्षित गेटेड रिहायशी इलाकों में रहने का खर्च नहीं उठा सकते, यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि महामारी की खबरें, पूर्वोत्तर के लोगों के साथ होती, रोज़ाना के नस्लवाद की खबरों के साथ साथ घटीं हैं. और यह निश्चित रूप से एक नारकीय स्थिति थी जहाँ आप घर से बाहर जाने और दूध के पैकेट खरीदने से हिचकिचाते थे. इस डर से इतना नहीं कि कहीं संक्रमित न हो जाएँ बल्कि ‘कोरोना’ कहलाये जाने के कारण अधिक, या किसी अन्य बदसूरत चीज़ से सामना होने के कारण. नस्लवाद एक सामान्य बात थी, महामारी ने तो इसे बस अपनी पूर्ण क्षमता के साथ विस्फोट करने का अवसर दिया है.

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चोन्थम रामेश्वरी मणिपुर से हैं व् संप्रति दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग से एम्.फिल. कर रही हैं.

यह आर्टिकल मूलतः अंग्रेजी भाषा में है जो हमारी अंग्रेजी भाषा वाली वेबसाइट पर छपा है. आर्टिकल को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहाँ  क्लिक करें.

अनुवाद: गुरिंदर आज़ाद

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